Tuesday, January 28, 2025

| নাগা মহিলা, নাগা হবার প্রক্রিয়া ||

    ||  নাগা মহিলা, নাগা হবার প্রক্রিয়া  ||

           এক নাগা সন্যাশিনীর মুখথেকে শোনা কথাই লিখছি-----

2001 সালের 9 জানুয়ারি থেকে 21ফেব্রুয়ারি  প্রয়াগে কুম্ভমেলা অনুষ্ঠিত হয়েছিল। 

এই মেলাটি উত্তরপ্রদেশের প্রয়াগরাজে গঙ্গা, যমুনা, এবং সরস্বতী নদীর মিলনস্থলে অনুষ্ঠিত হয়েছিল। 

প্রয়াগে কুম্ভ মেলা 2001-এর বিশেষত্ব: 

এই মেলাটি জ্যোতিষশাস্ত্রীয় গ্রহের সারিবদ্ধতার সাথে মিলেছিল।

এই মেলাটি সহস্রাব্দে প্রথম ছিল।

এই মেলায় প্রায় 70 মিলিয়ন দর্শনার্থী আসে।

এই মেলায় স্বামী সত্যানন্দ মকর সংক্রান্তি এবং মৌনী অমাবস্যায় সঙ্গমে পবিত্র ডুব দেন।

এই মেলায় এক নাগা সন্যাশিনীর সাথে অনেক আলাপ আলোচনার সুযোগ হয়েছিল । 

আজ আমি সেই কথার কিছু তুলে ধরছি।

বাকি কিছু কথা বলা বা লেখার নিষেধ আছে।

যেটুকু মনে আছে সেটুকুই লিখছি:::-------


মহিলা দের নাগা সাধু হবার জন্য বড়ই কঠিন পথ ও কঠিন নিয়ম পালন করতে হয়।

অতি ভীষণ ব্রহ্মচর্য পালন  করতে হয়।

গুরুজীর নিকট নিজের যোগ্যতার প্রমান তথা ঈশ্বরের প্রতি একাত্মতা ও নিষ্ঠার পরীক্ষা দিতে হয়।

এই সকল প্রক্রিয়ায় 10- থেকে 15 বৎসর লেগে যায়।

মহিলা নাগা সাধু হবার জন্য 10 বৎসর বা তার অধিক সময় ব্রহ্মচর্য পালন করতে হয়। মহিলা নাগা সাধু হবার প্রক্রিয়া এমন কঠিন প্রক্রিয়া যে অনেক জনই মাঝ পথে সাধনা ত্যাগ দিয়ে গার্হস্থ্য জবনে ফিরে যায়। কারন এমন কঠিন সাধনা করা সকলে দ্বারা সম্ভব হয় না।

মহিলা নাগাসাধু  সাধারণত লোকচক্ষুর আড়ালে বনে জঙ্গলে বা নিজের আখড়াতেই থাকেন। কুম্ভ বা মহাকুম্ভে সময় এনদের  দেখাযায় কুম্ভ মেলায়। মহিলা নাগা সাধু হতে নিজের শ্রাদ্ধ , নিজের পিন্ড দান  ও মস্তক মুন্ডন করতে হয়। নিজেকে সম্পুর্ন রূপে ঈশ্বরের নিকট সমর্পণ  করতে হয়।

প্ৰয়াগরাজে মহাকুম্ভ শুরু হতেই মহিলা নাগা সাধুদের নিয়ে বিশেষ ব্যবস্থার প্রস্তুতি ছিল। মহাকুম্ভে মহিলানাগা সাধু বিশেষ আকর্ষণের কেন্দ্রে ছিলেন।এবার অনুমান  হাজারেরও বেশি নাগা সন্যাশিনীর দীক্ষা অনুষ্ঠান হয়েছে। তবে  জুনা আখরাতেই মহিলানাগাসাধুর সংখ্যা সর্বাধিক। মহিলা নাগা সাধু হতে বড়ই কঠিন প্রক্রিয়া পার করতে হয়।

মহিলা নাগাসাধুদের 'নাগিন', 'অবধুত', 'মাই' ইত্যাদি নামে অভিহিত করা হয়।

অবধূতনিকেই শ্রীমহান্তের পদ দেওয়া হয়।

জুনা আখড়া 2013 সালে মাইওয়ারা কে

দোষনামি সন্যাশিনীর আখড়া হিসাবে মান্যতা প্রদান করা হয়। এনদের শিবির জুনা আখড়া শিবিরের ঠিক পাশেই রাখা হয় থাকে।

মাই অথবা অবধুতনীদের আখরা' থেকেই 'শ্রীমহন্তের' পদ প্ৰদান করা হয়।

'শ্রীমহন্তের' পদে নির্বাচিত সাধ্বী মহিলা সাধু শাহী স্নানের দিন পালকি চড়েই স্নানে যান নিজের আখড়ার ধ্বজা উঁচিয়ে, ডঙ্কা

বাজিয়ে সদলবলে।এমনটাই অনুমদন করা হয়।

নাগা সন্যাশিনীর হবার জন্য ভিষিন কঠিন প্রক্রিয়া পার করতে হয়।

মহিলার ঘর-পরিবারের ভীষণ ভাবে যাচাই করা হয়। তারপরে তাকে প্রমান দিতে হবে যে তিনি সকল মোহ মায়া ত্যাগ করতে সক্ষম। এভাবে ব্রহ্মচর্য পসলনে ব্রতী হয়ে , সকল পরীক্ষা নিরীক্ষায় উত্তীর্ণ হবার পর গুরু নিজে সন্তুষ্টির পরে সন্যাস ব্রত পালনের আদেশ দেন।

তার পরে নিজের শ্রাদ্ধ, নিজের পিন্ড দান,  মুন্ডনের ও নদী স্নান করে নিজের সকল বস্ত্র ত্যাগ করে গুরুজীর দেওয়া ভুভুত ও গেরুয়া এক বস্ত্রেই নিজের দেহ আবরণ করতে হয় এবং এর পরে দীক্ষা দেওয়া হয়। ভুভুত সারা অঙ্গে লেপন করে এক বস্ত্রেই থাকতে হয়। স্নানাদি ওই এক বস্তের করতে হয়।

পিন্ড দানের পরে গুরুজী প্রথমে কমন্ডুল দেবেন , সেই কমন্ডুল নিয়ে সমস্ত দিন জপ ধ্যান  ও ব্রহ্মমুহূর্তে শিবের জপ মরতে হয় তারপরে আখড়ার গুরু তথা আখড়ার 

ইষ্টদেবের পূজা ও জপ ধ্যান করতে হয়।

এর পরেই গুরুজী নুতন শিষ্যার নামকরণ করে 'মাতাজী' নামে সম্মানিত করেন।


দীক্ষা দানের পূর্বে গুরুজী তিনবার জিজ্ঞাসা করেন যে তার কোন মায়া মোহ আছে কিনা এবং সে চলে এখনই নিজের গৃহে ফিরে যেতে পারেন।

এমন ভাবে তিনবার তার পরীক্ষা নেওয়া হয় যাতে করে তার মধ্যে কোন প্রকার কখন অনুশোচনার তিল মাত্র না থাকে,

এবং এই নুতন জীবন যেন দৃঢ়তার সাথে পালন করতে সক্ষম হন।

তবেই দীক্ষা দানের প্রক্রিয়া শুরু হয়।

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Tuesday, January 21, 2025

27>|| जीवन मंगलमय हो,++HAPPY Anniversary--

 


जीवन मंगलमय हो,++HAPPY Anniversary--



आपके लिये भगवानसे यही मेरा प्रार्थना हैं::---


ईश्वरकी कृपासे  आपकी सभी मनोकामनाएं 

पूर्ण हों,

ईश्वर आपकी स्वास्थ, सुख और समृद्धि प्रोदान करें।

आपका हृदय सदा ही दुखोंसे मुक्त रहें,

आपका मन सदा ही चिन्ताओंसे मुक्त रहें,

आपका जीवन सदा हीं प्रसन्नताओंसे भरा रहें,

आपका जीवन सदा हीं रोग मुक्त रहें,

आपका हर पल शुभ सुंदर रहें,

परमेश्वर सदा के लीये आपका हृदय

सुख,शांति एबं खुशियोसे भरदें।

और भोलेनाथ की कृपा आप पर सदैव बनी रहें।



आपकी सपने सच हों,

सभी आशाएं पूरी हों।

सारे दुखों रहें दूर,

खुशिया रहे भरपूर।


मैं आपके लिए कामना करता हूं

आपकी जीवन मंगलमय हो,

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HAPPY Anniversary--


.A happy wedding anniversary is the celebration lots of love, trust, partnership, tolerance and tenacity. ..."

"May God bless you to live as long as you wish and love as long as you live. ..."


"Sacrifice and compromise makes a family  Beauty, healthy, wealthy."

So try for Sacrifice yourself,

And Compromise in every steps of life,

Any where and every where.


Seeking something for self and

Seeking self enjoyment is most

selfishness.

Asking for others and loving others

That is true love.

  <--------Adyanath------->

            11/12/2023

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26>|| আমি কোন লেখক নই। (লিখতে হবে)

 আমি কোন লেখক নই। (লিখতে হবে)

এ লেখা সবার জন্য নয় ৷  

লেখার নিয়ম কানুনও আমার জানানাই, জানতে চাইও না। কারণ আমি লিখি নিজের জন্য। নিজের সময় কাটাবার জন্য। 

তবে নিজে  বুঝি যে প্রতিটা লেখাই 

নিজের জীবনের সাথে জড়িত , কিছু সময়ের  জীবনদর্শন ৷ 

তার সাথে মিশে থাকে কিছু কথা, উত্থান, পতন, চাওয়া-পাওয়া, না পাওয়া, সুখ-দুঃখের "মাপা হাসি, চাপা কান্না ৷" 

কিছু লিখতে লিখতে হঠাৎ ঠাকুরের কথা মনে পড়লো ।

ঠাকুরের কথা বলতে গিয়ে একটা গল্প মনে পড়ে গেল,  "সেদিন ঠাকুর নিজের ঘরে একটা ঝুড়ি লুকোবার জন্য ভীষণ ব্যস্ত ৷ ঠিক সেই সময় ঠাকুরের কিছু ভক্ত সেখানে উপস্থিত হলেন ৷ ঠাকুর তাঁদের দেখে সেই ঝুড়িটি লুকোনোর জন্য ভীষণ ব্যস্ত হয়ে পড়লেন ৷ অনেক চেষ্টার পরও যা লুকোতে পারেননি তিনি ৷ শেষে হাসি মুখে ভক্তদের সামনে বেরকরে আনলেন ঝুড়িটি ৷ দেখা গেল  ঝুড়িটি ভর্তি সন্দেশ রয়েছে ৷ ঠাকুর হেসে তাঁদের বললেন, "দ্যাখ সারাদিন মায়ের নাম করলে এই ফল পাওয়া যায়"৷ 

আমার নিজের মনে হয়  ঠাকুর এক  সত্যকে খুব সহজে বুঝিয়ে দিলেন।

আর সেটি হলো 

"ভক্তির জগতে প্রভুর নাম করলে নিশ্চই তার ফল মেলে ৷" 


বিবেকানন্দ একবার বলেছিলেন, "নিজেকে শ্রদ্ধা না করলে কোনও কিছু অর্জন করা যায় না"৷

একথাও অতি সত্যি যে জীবনে এমন কিছু অনুভূতি থাকে যা ভাষায় প্রকাশ করা যায় না, ছুঁয়ে দেখা যায় না, উপলদ্ধি করতে হয় ৷ 

নিজের কাছেই সেটা রেখে দিতে হয়৷

যেটা নিজের মনে মনে অনেক কথা বুনে চলে প্রতিক্ষন,প্রতিমুহূর্ত, প্রতিদিন ৷ জীবনটাকে তো শৈশবের চির বসন্তের মতো ধরে রাখা যায় না আবার যৌবনের বেগও বেশিদিন স্থায়ী হয় না।

তাছাড়া জীবনের অনেক কিছুই মুছে যায় সময়ে কত ঘটনা, কত দিন, কত বছরের রোজনামচা, এমন অনেক কিছুঁই ভুলেযেতে হয়। ভুলে যেতে হয় সময়ের টানে। তবুও জীবনের কিছু কথা, কিছু স্মৃতি আজীবন মনে থেকেজায় ৷ তেমনি কিছু লেখা কোনও দিনও মোছেনা ৷ 



25>|| शिक्षा केंया हैं---লিখতে হবে

   शिक्षा केंया हैं---লিখতে হবে

सामान्य  अर्थमे स्कूल में अर्जित ज्ञान या कौशल को शिक्षा कहा जाता हैं।


शिक्षा केंया- इस प्रश्न का सरल उत्तर दिया हैं

प्रेमेश महाराज::---

जो शिक्षा से पूरे जीवन को सुखमय बना दे यह शिक्षा हैं।

वह शिक्षा बचपन का आनन्द जुवावस्था में दुःख मे न बदल जाए , जबानी की खुशी वयस्कता में  या   बूढ़ापे में उदासी के कारण न बने, वह सठीक शिक्षा हैं।


जो दुःख को दूर करता हैं, ख़ुशी बढ़ती है तथा

सुख को बनाये रखने में समर्थ हैं, उसे शिक्षा कहता हैं।

स्वामी विवेकानंद ने कहा---

जिससे मानव हृदय की पूर्णताका बिकाश हों वही शिक्षा हैं।

उन्होंने आत्म बिकाश की परिभाषा बताते हुए कहा---

शरीर,आत्मा,मन,और बुद्धि की समान 

अभिव्यक्ति ही सच्ची शिक्षा हैं, एक शब्दमें कहे तो यही मनुष्य का आत्म-विकास हैं।


जिसे ऐसी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला हो, अर्थात् वह व्यक्ति जिसका स्वास्थ्य अच्छा हो, जो ठीक से जीवित तथा प्राणवान हो।

 जागरूक और बुद्धिमान वही है जिसे हम उचित रूप से शिक्षित और सभ्य कहते हैं।


 एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऐसे शिक्षित व्यक्ति में सुख-दुःख की प्रबल भावना और सौन्दर्य की भावना होती है। जिस समाज में ऐसे संवेदनशील और संवेदनशील लोगों की संख्या जितनी अधिक होती है, वह समाज उतना ही अधिक सभ्य होता है।”


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2,--कोई शिक्षा को व्यक्ति की पूर्ण क्षमता को विकसित करने के लिए ज्ञान अर्जन और निरंतर अभ्यास की एक व्यवस्थित प्रक्रिया मानता है। शिक्षा प्रक्रिया किसी व्यक्ति के अंतर्निहित गुणों के पूर्ण विकास को प्रोत्साहित करती है और उसे समाज के उत्पादक सदस्य के रूप में स्थापित करने के लिए आवश्यक कौशल हासिल करने में मदद करती है। सामान्य अर्थ में शिक्षा कौशल या ज्ञान का अधिग्रहण है।


3---सदियों से, विभिन्न विचारकों ने शिक्षा को अलग-अलग तरीकों से परिभाषित किया है। फिर, समय के साथ-साथ शिक्षा की परिभाषा या अवधारणा और पद्धति में भी बदलाव आया है।



■4--शिक्षा शब्द की उत्पत्ति 'शस्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है शासन करना या सलाह देना।

सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा मानव व्यवहार में वांछित, अभीष्ट एवं सकारात्मक परिवर्तन है।


■5--फिर, अंग्रेजी में एजुकेशन शब्द लैटिन शब्द एजुकेयर या एजुकेटम से आया है, जिसका अर्थ है आंतरिक क्षमता को बाहर लाना या विकसित करना।



■6 – सुकरात के शब्दों में “शिक्षा असत्य का विनाश और सत्य का विकास है।

अरस्तू ने कहा था, "शिक्षा स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण है।"

 रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में “शिक्षा वह है जो न केवल हमें जानकारी प्रदान करती है; यह हमारे जीवन को सार्वभौमिकता के अनुरूप भी बनाता है।


■7 - ब्रह्मचारी या विद्यार्थी एक चौथाई ज्ञान आचार्य या शिक्षक से और एक चौथाई अपनी बुद्धि से प्राप्त करता है। अन्य छात्रों के साथ बातचीत करने से एक चौथाई लाभ प्राप्त होता है। शेष राशि उसके पूरे जीवन के दौरान अर्जित की जाती है। मानव जीवन इस विश्व प्रकृति के प्राकृतिक वातावरण में लिपटा हुआ है। मानव जीवन और गतिविधियाँ काफी हद तक प्रकृति पर निर्भर हैं। वर्तमान समय में चार दीवारों से घिरी व्यवस्था को छोड़कर भी प्रकृति ने शिक्षा प्राप्ति की भूमिका में बड़ी भूमिका निभायी है। प्रकृति एक महान शिक्षक है. जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रकृति प्रत्येक मनुष्य को प्रतिरोध से आच्छादित रखती है। प्रकृति लोगों को सक्रिय बनाती है। प्रकृति में दो तरह की चीजें हैं. चेतन और निर्जीव. मानव जीवन के प्रवाह में सजीव और निर्जीव प्रभाव सदैव प्रवाहित होते रहते हैं। अत: प्रकृति कोई निष्क्रिय इकाई नहीं है, उसमें भी जीवन शक्ति है! शिक्षक रूसो ने कहा, "प्रकृति के रचयिता के हाथ से निकलते ही सब कुछ अच्छा है, मनुष्य के हाथों में सब कुछ ख़राब हो जाता है"[उद्धरण वांछित] सब कुछ अच्छा है जो प्रकृति करती है। सब कुछ मानव हाथों से नष्ट हो जाए। वास्तविक शिक्षा वह शिक्षा है जो प्रकृति की गतिविधियों और प्राकृतिक सुंदरता की सराहना के माध्यम से होती है।


24>|| ইতিহাসনিষ্ঠ অমৃতকুম্ভ || লিখতে হবে

   

 || ইতিহাসনিষ্ঠ  অমৃতকুম্ভ  ||লিখতে হবে।

        <------আদ্যনাথ---->

কুম্ভ ও মহাকুম্ভের ইতিহাস কিছু জানতে চোখের পলক চায়না পড়তে।

অনের নথি, পুঁথি, গ্রন্থ  খুঁজে যেটুকু পাই,

জিজ্ঞাসু চিত্তে সেই টুকুই লিখে যাই।

কিছু ত্রুটি থাকলেও থাকতে পারে।

লিখতেবসে অনেক চিন্তাই মনে ভিড় করে।

তবে নিজের কিছু প্রশ্নের উত্তর খুঁজতেই এ-হেন প্রচেষ্টা। 

হয়তো কারুর ভালো নাও লাগতে পারে

লেখাটা।


কুম্ভ (12) বারো বছরে একবার,

মহাকুম্ভ 12×12=144 বৎসরে একবার।

এই কুম্ভ ও মহাকুম্ভের মাঝে 

আরো বিশেষ কটি কুম্ভ আছে।

একটি মেলা অর্ধকুম্ভ অনুষ্ঠিত হয় যেটি প্রতি 6(ছয়) বৎসর অন্তর অনুষ্ঠিত হয়।


কুর্ম পূরাণ অনুযায়ী মোট (12) বারটি কুম্ভের উল্লেখ পাওয়া যায়। 4(চার) টি কুম্ভ মর্ত্যে আয়োজিত হয়। আর শেষ 8(আট )টি কুম্ভ স্বর্গে আয়োজিত হয়। প্রচলিত বিশ্বাস অনুসারে প্রতি 144 বছরে আসে মহাকুম্ভ। 3 বছরে হয় কুম্ভ, 6 বছরে হয় অর্ধকুম্ভ, 12 বছরে পূর্ণ কুম্ভ, আর 144 বছরে মহাকুম্ভ। এই 144 বছরের মহাকুম্ভ অতি বিরল সংযোগে হয়। আর 2025 সালের মহাকুম্ভ সেই মহাকুম্ভ ঘিরেই এক ধার্মিক বিশাল মেলার আয়োজন। 

 

 ★★মহাকুম্ভ হল সমস্ত কুম্ভ মেলার মধ্যে সবচেয়ে পবিত্র। এটি মূলত প্রয়াগরাজে উদযাপিত হয়, যেখানে গঙ্গা, যমুনা এবং সরস্বতী নদী মিলিত হয়। আজ এই মহাকুম্ভ মেলা 13 জানুয়ারি থেকে 26 ফেব্রুয়ারি, 2025-এর মধ্যে অনুষ্ঠিত হচ্ছে।


মহাকুম্ভ একটি বিশাল ধর্মীয় মেলা যেটি প্রতি 144 বছরে একবার ঘটে । 

কুম্ভমেলা হলো হিন্দুধর্মের একটি গুরুত্বপূর্ণ মেলা ও তীর্থযাত্রা এবং উৎসবও বটে। 

মহাকুম্ভ মেলা (পবিত্র কলসের উৎসব)  এটি বিশ্বের বৃহত্তম জনসমাবেশ এবং ধর্ম বিশ্বাসের সম্মিলিত উৎসব। এই মণ্ডলীতে প্রাথমিকভাবে তপস্বী, সাধু, সাধ্বী, কল্পবাসী এবং জীবনের সর্বস্তরের তীর্থযাত্রীরা অন্তর্ভুক্ত।

কুম্ভ হিন্দু ধর্মের সবচেয়ে পবিত্র যোগ সময় হিসাবে বিবেচনা করা হয়। কুম্ভ মেলা হল এমন একটি অনুষ্ঠান যা অভ্যন্তরীণভাবে জ্যোতির্বিদ্যা, জ্যোতিষশাস্ত্র, আধ্যাত্মিকতা, আচার-অনুষ্ঠান ঐতিহ্য এবং সামাজিক-সাংস্কৃতিক রীতিনীতি এবং অনুশীলনের বিজ্ঞানকে অন্তর্ভুক্ত করে, এটি সকল সমাজ কে সকল বিষয়ে জ্ঞানে অত্যন্ত সমৃদ্ধ করে তোলে। মহাকুম্ভ

মেলার সাথে পৃথিবীর অন্য কোন মেলার তুলনা হয়  না। 


কুম্ভমেলা::-- ইউনেস্কো সাংস্কৃতিক ঐতিহ্য।

 হিন্দু ধর্মাবলম্বীদের একটি গুরুত্বপূর্ণ তীর্থযাত্রা, যা প্রতি 3,6,12 এবং144

 বছরে একবার পালিত হয়। এটি পৃথিবীর সবচেয়ে বড় ধর্মীয় সমাবেশ হিসেবে পরিচিত।

মেলাটি চারটি  তীর্থস্থানে অনুষ্ঠিত হয়:----

★প্রয়াগরাজ (যেখানে গঙ্গা, যমুনা এবং 

     সরস্বতী নদীর মিলন), 

★হরিদ্বার (গঙ্গা নদী), 

★নাসিক (গোদাবরী নদী) এবং 

★উজ্জয়িনী (শিপ্রা নদী)।

যদিও পরবর্তী সময়ে 

★2022 সালে, 700 বছরের বিরতির পর হুগলির বাঁশবেড়িয়া (হুগলি, সরস্বতী ও যমুনা নদীর ত্রিবেণী সঙ্গমেআবার কুম্ভ মেলার আয়োজন করে।)


●প্রতি তিন বছর অন্তর (কুম্ভ মেলা)

●প্রতি ছয় বছর অন্তর (অর্ধ কুম্ভ মেলা)

●প্রতি বারো বছর (পূর্ণ কুম্ভ মেলা)

●প্রতি ১৪৪ বছর পর (মহা কুম্ভ মেলা)

এই কুম্ভ পর্যায়ক্রমে প্রয়াগরাজ, হরিদ্বার, নাশিক, উজ্জয়িনীতে অনুষ্ঠিত হয়।

পশ্চিম বঙ্গের বাঁশবেড়িয়া তেও শুরু হয়েছে।


কুম্ভ মেলায় তীর্থযাত্রীর মধ্যে নাগা সাধু থেকে শুরু করে ধর্মের সমস্ত বিভাগ থেকে আসেন যারা 'সাধনা' অনুশীলন করেন এবং গভীরভাবে আধ্যাত্মিক অনুশাসনের একটি কঠোর পথ অনুসরণ করেন, এমন

গৃহত্যাগী তথা হারমিটরা যারা তাদের নির্জনতা ছেড়ে শুধুমাত্র সভ্যতা পরিদর্শন করতে এখানে আসেন। কুম্ভ মেলা, আধ্যাত্মিকতার সন্ধানকারীদের এবং হিন্দু ধর্মের অনুশীলনকারী সাধারণ মানুষের তথা সর্ব স্তরের মানুষের জন্য।


কুম্ভ মেলায় বেশ কিছু অনুষ্ঠান হয়;---

  হাতির পিঠে, ঘোড়ায় সওয়ার সাধু সন্ত  এবং ঘোড়ার রথের উপর 'পেশওয়াই' নামক আখড়ার ঐতিহ্যবাহী শোভাযাত্রা, 'শাহী স্নান'-এর সময় নাগা সাধুদের উজ্জ্বল তলোয়ার এবং আচার-অনুষ্ঠান এবং অন্যান্য অনেক সাংস্কৃতিক কর্মকাণ্ড যা লক্ষ লক্ষ তীর্থযাত্রীকে কুম্ভ মেলায় যোগ দিতে আকৃষ্ট করে।

কত রকমের বিচিত্র সব সাধনা রত নিচিত্র সকল সাধু।

কেউ বৎসরের পর বৎসর এক হাত তুলে সাধনার রত। কেউ বায়া হাত তুলে তো কেউ ডান হাত তুলে আছেন বৎসরের পর বৎসর।

কেউ ভয়ঙ্কর সব বিষাক্ত সাপ পুষেন তার মাথার জটর মধ্যে।



মহাকুম্ভ মেলা প্রয়াগরাজ 2025 ইং

প্রতি 12 বছর অন্তর পূর্ণকুম্ভ মেলা অনুষ্ঠিত হয়। আ বার 12 টি পূর্ণকুম্ভের পর আয়োজিত হয় মহাকুম্ভ মেলা। অর্থাৎ 144 বছরে একবার মহাকুম্ভ হয়। 



মহাকুম্ভ মেলার ঐতিহাসিক গুরুত্ব

বিশ্বাস অনুসারে, মহা কুম্ভ মেলাকে সমুদ্র মন্থনের সঙ্গে সম্পর্কিত বলে মনে করা হয়। কাহিনি অনুসারে, একবার ঋষি দূর্বাসার অভিশাপে ইন্দ্র ও অন্যান্য দেবতারা দুর্বল হয়ে পড়েন। এর সুযোগ নিয়ে অসুররা দেবতাদের আক্রমণ করে এবং এই যুদ্ধে দেবতারা পরাজিত হন। তখন সমস্ত দেবতা একত্রে ভগবান বিষ্ণুর কাছে সাহায্যের জন্য গেলেন এবং তাঁকে সমস্ত ঘটনা খুলে বললেন। ভগবান বিষ্ণু রাক্ষসদের সঙ্গে তাদের সমুদ্র মন্থন করে সেখান থেকে অমৃত আহরণের পরামর্শ দেন। সমুদ্র মন্থন থেকে অমৃতের পাত্র বের হলে ভগবান ইন্দ্রের পুত্র জয়ন্ত তা নিয়ে আকাশে উড়ে গেলেন। এই সব দেখে অসুররাও অমৃত পাত্র নিতে জয়ন্তের পিছনে ছুটে গেল এবং অনেক চেষ্টার পর অসুররা অমৃত পাত্রটি হাতে পেল। এরপর অমৃত কলশের উপর তাদের নিয়ন্ত্রণ প্রতিষ্ঠার জন্য 12 দিন ধরে দেবতা ও অসুরদের মধ্যে যুদ্ধ হয়। সমুদ্র মন্থনের সময়, অমৃত কলশের কিছু ফোঁটা হরিদ্বার, উজ্জয়িন, প্রয়াগরাজ এবং নাসিকে পড়েছিল, তাই এই চারটি স্থানে মহাকুম্ভ মেলার আয়োজন করা হয়।


কুম্ভমেলা প্রতি 3 বছরে একবার ঘটে। চারটি অবস্থানের মধ্যে মেলা ঘুরিয়ে ফিরিয়ে হয়, সেগুলি হল, হরিদ্বার, প্রয়াগরাজ, উজ্জয়িনী এবং নাসিক। 

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কুম্ভ মেলা অনুষ্ঠিত হয় চারটি পবিত্র স্থান: হরিদ্বার, উজ্জয়িন, নাসিক এবং প্রয়াগরাজ-এ প্রতি তিন বছর অন্তর অনুষ্ঠিত ধর্মীয় উৎসবের একটি সেটের নাম। এই আচার-অনুষ্ঠানগুলির মধ্যে পবিত্র নদীগুলিতে পবিত্র স্নান জড়িত, যা প্রতিটি ভক্ত বিশ্বাস করে যে এটি তাদের পাপ থেকে মুক্ত দিতে ও দেহ মনকে শুদ্ধ করে এবং তাদের আধ্যাত্মিকভাবে পুনরুজ্জীবিত করতে সহায়তা করে।


যাইহোক, কুম্ভ মেলে প্রতি বারো বছরে একবার হয়, আর মহাকুম্ভ মেলা প্রতি12×12=144 বৎসরে একবার হয়।

আর এবং মহাকুম্ভ হল সমস্ত কুম্ভ মেলার মধ্যে সবচেয়ে পবিত্র। এটি মূলত প্রয়াগরাজে উদযাপিত হয়, যেখানে গঙ্গা, যমুনা এবং সরস্বতী নদী মিলিত হয়। আসন্ন মহাকুম্ভ মেলা 13 জানুয়ারি থেকে 26 ফেব্রুয়ারি, 2025-এর মধ্যে অনুষ্ঠিত হচ্ছে।-


প্রয়াগ ও হরিদ্বারের মেলার মধ্যে সময়ের পার্থক্য প্রায় 6 বছর, যেখানে মহা (অর্থাৎ বৃহৎ) এবং অর্ধ (অর্থাৎ অর্ধেক) কুম্ভ মেলা অনুষ্ঠিত হয়। বিশেষ করে উজ্জয়িন ও নাসিকের কুম্ভ মেলার সঠিক বছর নিয়ে 20 শ ( বিশ )শতকে প্রবর্তক হয়েছে। নাসিক ও উজ্জয়িনের মেলা একই বছরে বা এক বছর ব্যবধানে অনুষ্ঠিত হয়,  সাধারণত প্রয়াগরাজ কুম্ভ মেলার ৩ বছর পর। 


ভারতের বিভিন্ন অঞ্চলে ছোট আকারের তীর্থযাত্রা ও স্নান উৎসবগুলোকে মাঘ মেলা, মকর মেলা বা অনুরূপ নামে ডাকা হয়। 

●কুম্বশ্বর বা কুম্বকোনম, তামিলনাড়ুর থাঞ্জাভুর জেলা  (একটি শহর। এটি থাঞ্জাভুর জেলার কুম্বাকোনাম তালুকের সদর দফতর। কুম্বকোনম শহরটি দুটি নদী দ্বারা বেষ্টিত, উত্তরে কাবেরী নদী এবং দক্ষিণে আরাসালার নদী )।


তামিলনাড়ুতে কুম্বকোনমের মহামহম ট্যাঙ্কে প্রতি ১২ বছর পর অনুষ্ঠিত মাঘ মেলাকে তামিল কুম্ভ মেলা বলা হয় ।যেখানে লক্ষ লক্ষ দক্ষিণ ভারতীয় হিন্দু অংশ নেন।  

●কুরুক্ষেত্র,  ●সোনিপত এবং ●নেপালের পানাউটি অঞ্চলে এই ধরনের স্নান মেলাগুলোকেও কুম্ভ মেলা বলা হয়।


কুম্ভ মেলার তিনটি প্রধান তারিখে সবচেয়ে বেশি সংখ্যক তীর্থযাত্রী অংশগ্রহণ করেন, যদিও পুরো উৎসবটি এই তারিখগুলোর আশেপাশে এক থেকে তিন মাস ধরে চলে। প্রতিটি মেলায় লক্ষ লক্ষ ভক্ত অংশ নেন, যার মধ্যে প্রয়াগ কুম্ভ মেলায় সবচেয়ে বড় সমাবেশ হয় এবং দ্বিতীয় বৃহত্তম সমাবেশ হয় হরিদ্বারে। 


এনসাইক্লোপিডিয়া ব্রিটানিকা এবং ভারতীয় কর্তৃপক্ষের মতে,  2019 সালের কুম্ভ মেলায় 200 মিলিয়নেরও বেশি হিন্দু একত্রিত হয়েছিলেন, যার মধ্যে সবচেয়ে ব্যস্ত দিনে প্রায় 5 কোটি মানুষ অংশগ্রহণ করেছিলেন। এটি বিশ্বের বৃহত্তম শান্তিপূর্ণ জনসমাগমগুলোর একটি এবং "বিশ্বের সবচেয়ে বড় ধর্মীয় তীর্থযাত্রীদের সমাবেশ" হিসেবে বিবেচিত হয়।  এই মেলাটি ইউনেস্কোর "মানবতার অমূল্য সাংস্কৃতিক ঐতিহ্যের প্রতিনিধিত্বমূলক তালিকা"-তে অন্তর্ভুক্ত হয়েছে।  মেলার বিভিন্ন দিনে তীর্থযাত্রীরা অংশ নেন।●●●





কুম্ভমেলা বহু ধরনের হয়। কুম্ভ, অর্ধকুম্ভ, পূর্ণ কুম্ভ, মহাকুম্ভ। 

চলতি বছরে ১৪৪ বছর পর মহাকুম্ভ আয়োজিত হতে চলেছে।


যতদূর জানাজায় কুম্ভ মেলার প্রচলন ঐতিহ্যগতভাবে 8ম (অষ্টম)শতাব্দীর হিন্দু দার্শনিক ও সাধু শ্রী আদি শঙ্করাচার্যের সঙ্গে যুক্ত। তিনি ভারতজুড়ে বিভিন্ন মঠ ও ধর্মীয় সমাবেশে দার্শনিক আলোচনা ও বিতর্ক চালু করার প্রচেষ্টা করেছিলেন। 

তবে, 19শ (উনিশ) শতকের আগে "কুম্ভ মেলা" নামে এই বিশাল তীর্থযাত্রার কোনও ঐতিহাসিক  প্রমাণ নেই। 

কিন্তু প্রাচীন পাণ্ডুলিপি ও শিলালিপিতে বার্ষিক মাঘ মেলার উল্লেখ পাওয়া যায়, যেখানে প্রতি 6 বা 12 বছর পর পর বৃহৎ সমাবেশ হত এবং একটি পবিত্র নদী বা কুণ্ডে স্নান ছিল এর মূল আচার।


বিশিষ্ট গবেষক কামা ম্যাকলিনের মতে, ঔপনিবেশিক যুগেরসামাজিক---

রাজনৈতিক পরিবর্তন  এবং নানা বিবর্তনের  হিসাবে প্রাচীন মাঘ মেলাকে আধুনিক কুম্ভ মেলা হিসেবে পুনরায় নামাঙ্কিত করা হয়, বিশেষ করে  1857 সালের বিদ্রোহের পর।

এই উৎসবটি প্রায় প্রতি ১২ বছর অন্তর একবার পালিত হয়,  যা হিন্দু চান্দ্র-পঞ্জিকা ও সূর্য পঞ্জিকা এবং 

বৃহস্পতি গ্রহের যোগের অথবা

বৃহস্পতি, সূর্য ও চন্দ্রের জ্যোতিষীয় অবস্থানের উপর নির্ভর করে। 


জ্যোতির্বিদ্যা অনুসারে কুম্ভ::---

( বৃহস্পতি , সূর্য এবং চন্দ্রের রাশিচক্রের অবস্থানের একটি বিশেষ সমন্বয় অনুসারে উল্লেখিত চারটি স্থানের উৎসবের তারিখগুলি অগ্রিম গণনা করা হয়। 

চারটি স্থানের মধ্যে আপেক্ষিক বছর পরিবর্তিত হয়, তবে চক্রটি প্রতি 12 বছরে পুনরাবৃত্তি হয়। যেহেতু বৃহস্পতির কক্ষপথ

11.86 বছরে সম্পূর্ণ হয়, তাই একটি ক্যালেন্ডার বছরের সমন্বয় প্রায় 8টি (আট টি) চক্রের মধ্যে দেখা যায়। অতএব, প্রায় শতাব্দীতে একবার, কুম্ভ মেলা 11 বছর পর একটি স্থানে ফিরে আসে।)


কুম্ভ ও মহাকুম্ভ মেলার সময় সূর্য, চন্দ্র এবং বৃহস্পতির অবস্থান দ্বারা নির্ধারিত হয়। 


যখন বৃহস্পতি কুম্ভ রাশিতে প্রবেশ করে এবং সূর্য এবং চাঁদ একটি নির্দিষ্ট উপায়ে সারিবদ্ধ হয়, তখন পবিত্র উৎসবের জন্য উপযুক্ত লগ্ন ও মুহুর্তের সংকেত দেয়।

এবং এই প্রান্তিককরণ প্রতি 12 বছরে একবার ঘটে।

এমন লগ্ন ও মুহূর্ত ও দর্শনীয় সংযোগের সময় শুধুমাত্র ক্যালেন্ডারের হিসাবের দ্বারা নির্ধারিত হয় না - এটি বিশেষ সংযোগ যা নক্ষত্র এবং গ্রহের সাথে সংযুক্ত!  কুম্ভ মেলা গঙ্গা, যমুনা এবং পৌরাণিক সরস্বতী নদীর পবিত্র সঙ্গমস্থলে অনুষ্ঠিত হয়। 

এ-হেন হিসাবের মূল জ্যোতির্বিদ্যা সংস্থার অবস্থান দ্বারা এর সময় নির্ধারণ করা হয়। সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ ঘটনা হল সূর্য, চন্দ্র এবং বৃহস্পতির প্রান্তিককরণ। 


কুম্ভের রাশিচক্র::---

যখন বৃহস্পতি কুম্ভ রাশিতে প্রবেশ করে , এবং সূর্য ও চন্দ্র সারিবদ্ধ হয়, তখন মহাকুম্ভের সময়। 

এই বিরল স্বর্গীয় প্রান্তিককরণ পবিত্র স্নানের জন্য বিশেষ মুহূর্তের সৃষ্টি হয়।বিশ্বাস করা হয় যে এমন মুহূর্তে বিশেষ সঙ্গম স্থানে স্নান করলে সমস্ত পাপ থেকে মুক্ত হওয়া যায়।


ভারতের উত্তরপ্রদেশের মহাকুম্ভ মেলা বিশ্বের অন্যতম বৃহৎ ধর্মীয় সমাবেশ। মহাকুম্ভ মেলাকে ইউনেস্কো বিশ্ব সাংস্কৃতিক ঐতিহ্য  হিসেবে স্বীকৃতি দিয়েছে। মহাকুম্ভ মেলা শুধুমাত্র একটি ধর্মীয় উৎসব নয়। এটি ভারতীয় সংস্কৃতি ও ঐতিহ্যের অনুপম প্রকাশ। 

মহাকুম্ভ শুরু পৌষ পূর্ণিমায় 

(13 জানুয়ারি) এবং মহাস্নান সমাপ্ত হবে মহা শিবরাত্রিতে (26 ফেব্রুয়ারি)

এই বছর 6 সপ্তাহের মহাকুম্ভ মেলায় 50 কোটি তীর্থযাত্রীর আগমন ঘটবে বলে 

অনুমান  করা হয়েছে। 


 শাস্ত্রেও উল্লেখ আছে যে প্রয়াগরাজকে তীর্থরাজ  বলা হয়। কারণ এমনও একটি বিশ্বাস আছে যে ব্রহ্মা নিজে এখানে প্রথম যজ্ঞ করেছিলেন, 

 শুধু তাই নয়,অমৃত পাওয়ার জন্য দেবতা ও অসুরদের মধ্যে প্রচণ্ড যুদ্ধ হয়েছিল 12 দিনধরে এই 12 দিন একজন মানুষের কাছে ১২ বছরের সমান। এই কারণেই প্রতি ১২ বছরে মহাকুম্ভের আয়োজন করা হয় এবং জ্যোতিষশাস্ত্র অনুসারে, একটি কারণ হল যখন বৃহস্পতি গ্রহ বৃষ রাশিতে থাকে এবং সেই সময় সূর্য মকর রাশিতে আসেন। তখন প্রয়াগরাজে কুম্ভমেলার আয়োজন করা হয়। একইভাবে, যখন বৃহস্পতি কুম্ভ রাশিতে এবং সূর্য  মেষ রাশিতে গমন করেন, তখন হরিদ্বারে কুম্ভের আয়োজন করা হয়। যখন সূর্য এবং বৃহস্পতি উভয় গ্রহই সিংহ রাশিতে থাকে, তখন নাসিকে মহাকুম্ভ অনুষ্ঠিত হয়। 

আবার বৃহস্পতি যখন সিংহ রাশিতে এবং সূর্য মেষ রাশিতে থাকে, তখন উজ্জয়নে কুম্ভের আয়োজন করা হয়।


 2019 সালের 4 ফেব্রুয়ারি কুম্ভ মেলায় ইতিহাসে সবচেয়ে বড় শান্তিপূর্ণ জনসমাগম হয়েছিল। 

এমন মেলা প্রায় ১২ বছর অন্তর বৃহস্পতি তার কক্ষপথে  একটি পূর্ণ প্রদক্ষিণের সময় অনুষ্ঠিত হয়। 


এই মেলা ভারতের চারটি নদীতীরবর্তী তীর্থস্থানে পালিত হয়: 

★প্রয়াগরাজ,(গঙ্গা-যমুনা-সরস্বতী নদীর মিলনস্থল), 


★হরিদ্বার (গঙ্গা নদীতীরবর্তী তীর্থস্থান), 

★নাসিক (গোদাবরী নদীতীরবর্তী তীর্থস্থান) এবং 

★উজ্জয়িনী (শিপ্রা নদীতীরবর্তী তীর্থস্থান)। 

তবে 2022 খ্রিস্টাব্দ থেকে পঞ্চম স্থানে এই মেলা পুনরারম্ভ করা হয়েছে, আর সেই পঞ্চম কুম্ভ মেলাটি হল বাঁশবেড়িয়া ত্রিবেণী সঙ্গম কুম্ভ মেলা। 700 বছর বন্ধ থাকার পর পশ্চিমবঙ্গের হুগলি জেলার বাঁশবেড়িয়ার কাছে হুগলি, সরস্বতী ও যমুনা নদীর ত্রিবেণী সঙ্গমে এই মেলার পুনরুদ্ধার করা হয়। প্রয়াগরাজ, হরিদ্বার, নাসিক ও উজ্জয়িনীর কুম্ভ মেলা ইউনেস্কো অধরা সাংস্কৃতিক ঐতিহ্যের তালিকায় অন্তর্ভুক্ত, কিন্তু বাঁশবেড়িয়ার কুম্ভমেলা এখনো এই তালিকায় স্থান পায়নি।


তবে নিশ্চিত রূপে প্রতি তিন বছর পর পর এলাহাবাদ, হরিদ্বার, নাসিক এবং উজ্জয়িনীতে অনুষ্ঠিত হয় কুম্ভ।


উৎসবের মূল আচার হল নির্দিষ্ট তিথি ও সংযোগ সময়ে নদীতে ডুব দেওয়া বা স্নান করা। যা কিনা পাপ মোচনের উপায় বলে মনে করা হয়। 

এছাড়াও, মেলায় বিভিন্ন দোকান পাট, শিক্ষা কার্যক্রম, সাধুদের ধর্মীয় বক্তৃতা, সন্ন্যাসীদের সমাগম এবং বিনোদনের ব্যবস্থা থাকে। হিন্দুধর্মে বিশ্বাসী মানুষ বিশ্বাস করেন যে , এই নদীগুলিতে স্নান করলে অতীতের ভুলের বা সকল পাপকর্মের  প্রায়শ্চিত্ত হয় এবং পাপথেকে মুক্তি পাওয়া যায়। 


কুম্ভ এবং মহাকুম্ভ মেলার মধ্যে পার্থক্য: তাৎপর্য এবং পরিমাপক স্কেলে কুম্ভমেলা এবং মহাকুম্ভ মেলা হল হিন্দু ধর্মের দুটি বৃহত্তম ধর্মীয় উৎসব। যদিও উভয়ই আধ্যাত্মিক শুদ্ধির জন্য লক্ষ লক্ষ ভক্তকে আকৃষ্ট করে, প্রতি 12 বছরে অনুষ্ঠিত মহাকুম্ভকে সবচেয়ে পবিত্র বলে মনে করা হয়। তাদের অনন্য তাৎপর্য, আচার -অনুষ্ঠান এবং বিশ্বব্যাপী লক্ষ লক্ষ অনুসারীদের মনের গভীর প্রভাব লক্ষণীয়।


কুম্ভ ও মহাকুম্ভ এমন মেলা যে মেলা

সারা বিশ্ব থেকে লক্ষ লক্ষ মানুষকে আকৃষ্ট করে, এক অদ্ভুত একক বিশ্বাসে আবদ্ধ, আধ্যাত্মিক পুনর্জন্ম কামনা করে এবং তাদের নিজের নিজের ও সমাজের পাপ শুদ্ধ করেনের তাগিদে । 

এটা কোনো দূরের স্বপ্নের কল্পনা নয় ,

এটিই কুম্ভমেলা এবং মহাকুম্ভ মেলার বাস্তবতা - হিন্দুধর্মের সবচেয়ে বড় এবং সবচেয়ে ভয়ঙ্কর ধর্মীয় মণ্ডলীগুলির মধ্যে দুটি। 

কিছু নির্দিষ্ট সময় ও কয়েক বছর অন্তর, এই পবিত্র উৎসবগুলি ভারতের পবিত্র নদীতীরে অনুষ্ঠিত হয় যেখানে ভক্ত, আচার-অনুষ্ঠান ও ভক্ত নিজ ভক্তির জোয়ারে সম্পুর্ন নদীতটকে  ভক্তিসমুদ্রে রূপান্তরিত করে। 

সে যাইহোক, কুম্ভমেলা এবং মহাকুম্ভ মেলা বাহ্যিক রূপে একই প্রকার হলেও

একই থেকে একে অন্য থেকে অনেক দূরে। যদিও তারা আধ্যাত্মিক তাত্পর্য এবং বিপুল অংশগ্রহণের সাধারণ বিভাগ গুলি ভাগ করে নেয় ফলে তাদের পার্থক্যগুলি কোন পরিমাপক স্কেল বা সময়সীমার বাইরে চলে যায়। 


এই দুটি উৎসব বা মেলা  হিন্দু সংস্কৃতিতে অনন্য, প্রতিটির নিজস্ব আলাদা গভীর ও গম্ভীর পরিচয়ের আলাদা ইতিহাস এবং উদ্দেশ্য রয়েছে। 

কুম্ভ মেলা এবং মহাকুম্ভ মেলার মধ্যে পার্থক্য রয়েছে এবং প্রতিটিকে বিশ্বাস ও ঐতিহ্যের একটি স্মারক উদযাপন করে তোলে।

শাস্ত্র, তিথি,অনুসারে স্নানের বিশেষ দিন গুলি::--

পৌষ পূর্ণিমা,,-- মকর সংক্রান্তি; -- 

মৌনী অমাবস্যা::---বসন্ত পঞ্চমী;;---

মাঘী পূর্ণিমা;;--মহাশিবরাত্রি।


কুম্ভ মেলাকে নানা ভাবে শ্রেণীবদ্ধ করা হয় যেমন::---

●পূর্ণ কুম্ভ  (কখনও কখনও শুধু কুম্ভ বা "পূর্ণ কুম্ভ" বলা হয়), একটি নির্দিষ্ট স্থানে প্রতি 12 বছর পর পর অনুষ্ঠিত হয়।


●অর্ধ কুম্ভ মেলা ("অর্ধ কুম্ভ") প্রায় প্রতি 6 বছর অন্তর প্রয়াগরাজ এবং হরিদ্বারে দুটি পূর্ণ কুম্ভ মেলার মধ্যে অনুষ্ঠিত হয়। 


●মহাকুম্ভ, যা প্রতি 12টি পূর্ণকুম্ভমেলায় অর্থাৎ প্রতি 144 বছর পর পর অনুষ্ঠিত হয়।


★★2019 সালের প্রয়াগরাজ কুম্ভ মেলায়, উত্তর প্রদেশের মুখ্যমন্ত্রী যোগী আদিত্যনাথ ঘোষণা করেন যে অর্ধ কুম্ভ মেলা (প্রতি 6 বছর অন্তর আয়োজিত) কেবল "কুম্ভ মেলা" নামে পরিচিত হবে এবং কুম্ভ মেলা (প্রতি 12 বছর পরপর আয়োজিত) "মহা কুম্ভ মেলা" হিসেবে পরিচিত হবে। 


এছাড়াও ভারতের অসংখ্য জায়গা এবং মেলাকে স্থানীয়ভাবে তাদের কুম্ভ মেলা হিসেবে উল্লেখ করা হয়েছে। এর মধ্যে চারটি স্থান ব্যাপকভাবে কুম্ভ মেলা হিসেবে স্বীকৃত: প্রয়াগরাজ, হরিদ্বার, ত্রিম্বক-নাসিক এবং উজ্জয়িনী। অন্যান্য স্থানগুলিকে কখনও কখনও কুম্ভ মেলা বলা হয় - স্নানপর্ব এবং তীর্থযাত্রীদের উল্লেখযোগ্য অংশগ্রহণ সহ - কুরুক্ষেত্র, এবং সোনিপাত অন্তর্ভুক্ত।

                 (সঙ্কলিত)

   <-------আদ্যনাথ রায় চৌধুরী----->

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প্রয়াগরাজ ::--13/01/2025


উত্তরপ্রদেশের প্রয়াগরাজে আজ থেকে শুরু হয়েছে মহাকুম্ভ মেলা। এই ঐতিহাসিক অনুষ্ঠানে গঙ্গা, যমুনা ও পৌরাণিক সরস্বতীর সঙ্গমে ভারত-সহ বিদেশের কোটি কোটি ভক্ত তাদের বিশ্বাস নিয়ে এসেছেন এই পুণ্য নদী সঙ্গমের মহান পুণ্য ভূমিতে। 

১৪৪ বছর পর আজ মহাকুম্ভের শুভ যোগ  ঘটছে এই সঙ্গমে।

মহাকুম্ভের মূল ধার্মিক আকর্ষণ স্নান।

সেখানে শাহী স্নানেই বিশেষ মহত্ব।


বিশেষ করে  মহত্বপূর্ন 6 টি শাহী স্নানের    মহত্বই  বেশি, সেই কারনেই এই শাহী স্নানের সংযোগ ও শুভ সময় ও তার নিয়ম মহাকুম্ভ 2025 ::--

প্রথম রাজকীয় স্নান, শাহী স্নান

পূর্ণিমা তিথি শুরু হয়েছে 13 জানুয়ারি অর্থাৎ আজ ভোর  5:03 মিনিটে এবং 14 জানুয়ারি  3:56 মিনিটে  তিথি শেষ হবে।


(এবার মহাকুম্ভে 40 কোটিরও বেশি ভক্ত অংশগ্রহণ করবেন বলে আশা করা হচ্ছে।

সমগ্র অনুষ্ঠানটিকে বিশেষ করে তুলতে মহাকুম্ভ মেলা এলাকায় ভক্তদের গায়ে গোলাপ ফুল বর্ষণ করা হচ্ছে। উদ্যানপালন বিভাগের পক্ষ থেকে হেলিকপ্টারের মাধ্যমে সঙ্গম এলাকায় অর্থাৎ পুরো 4000 হেক্টর মেলা এলাকায় ভক্তদের ওপর গোলাপের পাপড়ি বর্ষণের  করা হয়েছে। প্রতিটি স্নান উৎসবে প্রায়

 20 কুইন্টাল গোলাপের পাপড়ি বর্ষণ করতে হয়েছে।)


এই সময়ে অমৃতস্নানের বিশেষ তাৎপর্য রয়েছে, যেখানে প্রথমে ঋষি-সাধুরা এবং তারপর সাধারণ মানুষ স্নান করবেন।

মহাকুম্ভ মেলায় 1100 জন পুরোহিত একত্রে  মহাযজ্ঞ করবেন। এছাড়া কত রকমের সাধু আছেন 

'ই-রিকশা বাবা

মাথায় ধান চাষ, প্রয়াগের মহাকুম্ভে Viral 'ধানওয়ালে বাবা' 

প্রতি 12 বছর অন্তর হরিদ্বার, প্রয়াগরাজ, উজ্জয়িনী এবং নাসিকে পূর্নকুম্ভ মেলার আয়োজন করা হয় এবং এর মধ্যে প্রয়াগরাজে অনুষ্ঠিত মহাকুম্ভ সবচেয়ে জমকালো। মহাকুম্ভ, যা 30-45 দিন ধরে চলে, হিন্দুদের কাছে অনেক তাৎপর্য রয়েছে।


মহাকুম্ভের নিয়ম

1>. মহাকুম্ভ মেলায় অংশগ্রহণকারী ভক্তদের শুদ্ধ ভাবে থাকা উচিত।

2> মহাকুম্ভে, প্রথমে স্নান করবেন ঋষি ও সাধুরা এবং তার পরেই সাধারণ মানুষ স্নান করতে পারবেন।

3>মহা কুম্ভ মেলায় স্নানের জন্য একটি নির্দিষ্ট সময় রয়েছে, যা অনুসরণ করা আবশ্যক।

4> মহা কুম্ভ মেলায় অহিংসা ও করুণার নীতি অনুসরণ করা প্রয়োজন।

5> মহাকুম্ভ মেলায় মাদকদ্রব্য সেবন নিষিদ্ধ। এছাড়াও, হিংসা ও ক্রোধ প্রদর্শন নিষিদ্ধ।


শাহী স্নানের অন্যান্য তারিখ 

●প্রয়াগরাজে আয়োজিত মহাকুম্ভে 13 জানুয়ারি 2025 প্রথম রাজকীয় স্নান হবে। এর পরে, অন্যান্য শাহী স্নানের তারিখগুলি নিম্নরূপ:


●দ্বিতীয় শাহী স্নান হবে মকর সংক্রান্তিতে, ১৪ জানুয়ারি ২০২৫।

●তৃতীয় শাহী স্নান অনুষ্ঠিত হবে মৌনী অমাবস্যা ২৯ জানুয়ারি ২০২৫ তারিখে।

●চতুর্থ শাহী স্নান অনুষ্ঠিত হবে বসন্ত পঞ্চমীতে, ২০২৫ সালের ৩ ফেব্রুয়ারি।

●পঞ্চম শাহী স্নান অনুষ্ঠিত হবে মাঘ পূর্ণিমা, ১২ ফেব্রুয়ারি ২০২৫ তারিখে।

২০২৫ সালের ২৬  ফেব্রুয়ারি ●মহাশিবরাত্রিতে শেষ শাহী  স্নান অনুষ্ঠিত হবে।

শাহী স্নানের নিয়ম

মহাকুম্ভে শাহী স্নানের কিছু বিশেষ নিয়ম অনুসরণ করা হয়। মহাকুম্ভে প্রথমে স্নান করেন নাগা সাধুরা। নাগা সাধুদের স্নানের প্রথা বহু শতাব্দী ধরে চলে আসছে। এর পেছনে রয়েছে ধর্মীয় বিশ্বাস। এছাড়া পারিবারিক জীবন যাপনকারী মানুষের জন্য মহাকুম্ভে স্নানের নিয়ম কিছুটা আলাদা। নাগা সাধুদের পরেই গৃহস্থদের সঙ্গমে স্নান করা উচিত। স্নান করার সময়, 5(পাঁচ) টি ডুব দিতে হয় , তবেই স্নান সম্পূর্ণরূপে বিবেচিত হবে। স্নানের সময় সাবান বা শ্যাম্পু ব্যবহার করবেন না। কারণ এটি পবিত্র জলকে দূষিত বলে মনে করা হয়।

মহাকুম্ভে শাহী স্নান ও দানের পর অবশ্যই  হনুমান ও নাগবাসুকির দর্শন করতে হবে। এটা বিশ্বাস করা হয় যে মহাকুম্ভের ধর্মীয় যাত্রা অসম্পূর্ণ বলে মনে করা হয় যদি আপনি শাহী  স্নানের পরে এই দুটি মন্দিরের যে কোনও একটিতে না যান।


  

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 কুম্ভ স্নানের পরেই নাগভাসুকির সহ আরও চারটি মন্দির দর্শন একান্ত জরুরি

নয়তো কুম্ভ স্নানের পুণ্য লাভ হয় না।

আর পুণ্য লাভ না  হলে কুম্ভ স্নানেই বৃথা হয়ে যায় ।

অতঃ কুম্ভ স্নানের পরেই পাঁচ টি মন্দির দর্শন অতি জরুরি।

সেই মন্দির গুলি 

1>নাগভাসুকি মন্দির,

2>হনুমান মন্দির(এখানে হনুমানজী শুয়ে 

      আছেন.)

3>সরস্বতী মন্দির।

4>অক্ষয় বট ।

5>পাতালপুরীর অর্ধ নারীশ্বর।

6>অলোক শঙ্করী মন্দির( এখানেG



■■1>নাগভাসুকি মন্দির ::--দারাগঞ্জ ঘাট, রামেশার মন্দিরের কাছে, দারাগঞ্জ উত্তরপ্রদেশ।

মন্দিরে 30-40টি ধাপ সিঁড়ি চড়েই নাগাভাসুকির দর্শন মেলে

★প্রত্যেক ভক্ত ও তীর্থযাত্রীর প্রয়াগরাজ যাত্রা সম্পূর্ণ হয় না যতক্ষণ না তিনি নাগবাসুকির দর্শন পান।

★নাগবাসুকি মন্দিরটি সাপের রাজা বাসুকিকে উৎসর্গ করা হয়েছে।

★এটিই একমাত্র স্থান যেখানে আপনি ভীষ্ম পিতামহ মূর্তি পূজা দেখতে পারেন।

★প্রতি বছর নাগ পঞ্চমী উপলক্ষে মন্দিরের কাছে মেলার আয়োজন করা হয়।


নাগবাসুকি মন্দিরটি উত্তর প্রদেশের দারাগঞ্জ এলাকার উত্তর প্রান্তে গঙ্গার তীরে অবস্থিত।

মন্দিরটিতে ভগবান শিব, ভগবান গণেশ, দেবী পার্বতী এবং ভীষ্ম পিতামহ সহ অন্যান্য দেবতাদের উত্সর্গীকৃত বেশ কয়েকটি ছোট মন্দির রয়েছে। এই মন্দিরটি আশি মাধব নামেও পরিচিত এবং এটি শহরের এবং এর আশেপাশে অবস্থিত 12টি মাধব মন্দিরের মধ্যে একটি। এই একমাত্র স্থান যেখানে আপনি ভীষ্ম পিতামহ মূর্তি পূজা দেখতে পারেন।


নাগবাসুকি মন্দিরের পৌরাণিক কাহিনিকে

নাগবাসুকিও বলা হয়েছে অবশিষ্টরাজ, সর্পনাথ, অনন্ত এবং সর্বাধ্যক্ষ। এই মন্দির সম্পর্কে বিখ্যাত যে আওরঙ্গজেব যখন ভারতে মন্দিরগুলি ভেঙে ফেলছিলেন, তখন তিনি নিজেই বহুল আলোচিত নাগবাসুকি মন্দির ভেঙে ফেলতে এসেছিলেন। কিন্তু, তিনি মূর্তির দিকে তরবারি চালাতে গিয়ে তলোয়ারটি মূর্তির মধ্যে আটকে যায় এবং হঠাৎ ভগবান নাগবাসুকির দিব্য রূপ দেখা দেয়। তার দানবীয় রূপ দেখে আওরঙ্গজেব ভয়ে কাঁপতে থাকেন এবং অজ্ঞান হয়ে পড়েন।


এই মন্দির সম্পর্কে একটি পৌরাণিক বিশ্বাস রয়েছে যে নাগা রাজবংশের রাজা বাসুকি সমুদ্র মন্থনে অংশ নিয়ে এখানে বিশ্রাম নিয়েছিলেন। বিশ্বাস করা হয় এখানে এসে পূজা করলে কাল সর্প দোষ চিরতরে দূর হয়। জনশ্রুতি আছে যে সে সময় তৎকালীন মারাঠা রাজা কুষ্ঠ রোগে ভুগছিলেন। তাই রাজ পণ্ডিত রাজি হয়েছিলেন যে রাজা যদি অসুস্থতা থেকে মুক্তি পান তবে তিনি মন্দিরটি সংস্কার করবেন। বিপজ্জনক রোগ থেকে মুক্তি পেলেন রাজা। কৃতজ্ঞ রাজ পণ্ডিত মন্দিরের সাথে একটি পাকা ঘাট নির্মাণ করেন।


নাগাবাসুকি মন্দির দর্শনের সময়

মন্দিরটি সপ্তাহজুড়ে খোলা থাকে এবং দর্শনের সময় সকাল 5:30 থেকে রাত 10:30 পর্যন্ত। 


প্রতি বছর নাগ পঞ্চমী উপলক্ষে মন্দিরের কাছে একটি মেলার আয়োজন করা হয়। এ সময় মন্দিরে প্রচুর ভক্তের সমাগম হয়। কুম্ভ, অর্ধ কুম্ভ, মাঘ মেলা এবং নাগপঞ্চমীর দিনে লক্ষ লক্ষ তীর্থযাত্রী মন্দিরে যান। পুরাণেও এই মন্দিরের বর্ণনা পাওয়া যায়। শ্রাবণ মাসে এই মন্দিরে শান্তি আচার করা হয়। নাগবাসুকি মন্দিরে রুদ্রাভিষেক, মহাভিষেক এবং কাল সর্পদোষ অনুষ্ঠান করা হয়।

নাগাবাসুকি মন্দিরটি এলাহাবাদ জংশন রেলওয়ে স্টেশন থেকে প্রায় 7.4 কিলোমিটার দূরে প্রয়াগরাজের নাগাবাসুকি এলাকায় অবস্থিত। রেলস্টেশন থেকে  সহজেই অটোরিকশা, ট্যাক্সি বা লোকাল বাসে করে মন্দিরে পৌঁছন যায়। সিভিল লাইন বাস স্ট্যান্ড থেকে নাগাভাসুকি পর্যন্ত নিয়মিত বাস চলাচল করে।

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23>|| পিকনিকের কথা || লিখতে হবে

     || পিকনিকের কথা  ||লিখতে হবে।

      <-------আদ্যনাথ----->


কিছুদিন হল মনে ভীষণ হাঁসফাঁস,

খুঁজতে চাইছিলাম পিকনিকের ইতিহাস।

নানান ভাবনা চিন্তা মনকে করছে তাড়া,

শুধু লেজ খুঁজতেই আমি হলাম ছন্নছাড়া।


পিকনিকের ইতিহাস খুঁজতেই আমি জব্দ, জানলাম পিকনিক একটি ফ্রেঞ্চ শব্দ।    

এ শব্দের তাৎপর্য, প্রকৃতির মাঝে বসে, খাওয়া-দাওয়া আর হৈ হুল্লোড় করা। 


নদীতীরে,পার্কে,বন-বাদারে বা গ্রামের শেষে,

একটু আনন্দ করে খাওয়া সকলে মিলে মিশে। 

মাঠ ময়দান অথবা সবুজে ঘেরা খেত খানি, 

চড়ুইভাতি অথবা বনভোজনের আদর্শ 

স্থান জানি।


চড়ুইভাতির আছে অনেক নাম,

নানা দেশে নানা স্থানে ভিন্য ভিন্য নাম।

ভুলকা ভাত,উত্তরাঞ্চলের এক উৎসবের মতো,

ঠিক যেন আমাদের বনভোজের মতো।


ফসল কাটার পরে খালি মাঠে,

গ্রামবাসী মাতে ভুলকা ভাতে।

মাঠে উনুন বানিয়ে রান্নার করা,

ঠিক যেন আমাদের ছোট বেলা।


মাঠেই নানান রকমের খেলা ধুলা,

কেউ আনছে তরকারি, কেউ তেল, মশলা

সকলে মিলে রান্নার, সে এক মহাভোজের জটলা।

কলাপাতা নিয়ে সারি সারি বসে পড়া

সকলে মিলে একসাথে বসে খাওয়া।


সেদিন ছিল কত রকমারি সব খেলা

গোল্লাছুট, দাড়িয়াবান্ধা, হাডুডু,বউচি,

আরও কত খেলা যা প্রায় ভুলেই গেছি।

গ্রামবাংলার ঐতিহ্যবাহী সব খেলা

রান্না শেষ হতেই কলাপাতা নিয়ে খেতে বসা।


রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরের সেই "চড়–ইভাতি"

বোধ হয় হারিয়ে যাচ্ছে, পিকনিক আর 

আধুনিকতার ভারে।

সেদিনের গ্রাম বাংলার সেই চড়ুইভাতি 

আজ আর পাইনা খুঁজে।


আমরা প্রতিবৎসর পিকনিকে মাতী

এ-যেন আমাদের এক আনন্দের রীতি,

একদিনের এ-হেন আনন্দ রীতি,

আমাদের হৃদয়ে বৎসর ভরের প্রীতি।


চড়ুইভাতি শব্দের উৎপত্তি এক মজার দৃষ্টি ভঙ্গি,

বন বাদাড়ে চড়ুই পাখিদের কিচিরমিচির

মিলে দুই সঙ্গী,

ওদের ডাকের ছন্দ ও সংগৃহীত খাবার একসঙ্গে খাওয়া,

এভাবেই হয়তো চড়ুইভাতি শব্দ খুঁজে পাওয়া। 



শিশু কালে মনেপড়ে শিশুদের সংগ্রহ করা চালে ডালে রান্না খাওয়াই হচ্ছে চড়ুইভাতি। 

পৌষের শীতে কিশোর-কিশোরীরা মিলে, বাড়ি থেকে চাল-ডাল হাঁড়িকড়াই নিয়ে,

খোলা জায়গায় অথবা গাছের নিচে ,

রান্না করে খাওয়া সকলে এক সাথে মিলে।


সেদিনের সেই চড়ুইভাতিতে খাবারের পাশাপাশি দিনভর খেলাধুলা আনন্দ -উৎসব হতো।

শীতের শুরুতেই চড়ুইভাতি জন্য সুন্দর জায়গা বাছা হতো।



আজ আমরা বনভোজ ভুলেই গেছি,

পিকনিক অর্থ শীতকালীন গেটটুগেদার বুঝি। 

ছেলেবেলার সেই চড়ুইভাতি, 

এখন কতোই না রকমফের রীতি।


পিকনিক সয়েছে অনেক বিবর্তন,

পিকনিক প্রথার শুরু বোধহয় 1692 সালে,

সেকালে কয়েকজন মিলে শীতকালে, 

খানাপিনা করতো সরাইখানায় গিয়ে। 


পরে এর সাথে যুক্ত হলো মনোরঞ্জক আড্ডা। 

সেদিনের সেই  পিকনিক ছিল শুধু রাজকীয় আয়োজনে। 

পরে সাধারণ মানুষও মাতে বিকল্প আয়োজনে।


আর সেই রাজা-বাদশার যুগে,

রাজার ছেলেরা সৈন্যসামন্ত নিয়ে,  ভোজনের আয়োজন করতেন বনে-জঙ্গলে গিয়ে।

আর এভাবেই বনভোজনের রেওয়াজ শুরু তখন থেকে।


সময়ের পরিবর্তনের অনেক গল্প হয়েছে পিকনিককে নিয়ে,

আজ বনভোজন হয় ডিজিটাল নিয়মে।

ঠাকুর চাকর রাঁধুনি ও গ্যাসের উনুন নিয়ে।

কেউ পিকনিক করে টুর প্যাকেজ নিয়ে।



আজ পাল্টে গেছে পিকনিকের  রূপ বৈচিত্র্য,

পিকনিকের নামে ভোজন,আনন্দ হৈ-হুল্লোরের চরিত্র।

এ সময় পিকনিক স্পট, ক্যাটারিং কোম্পানি, যাতায়াত ব্যবস্থা করতে হিমশিম খেতে হয় অনেককেই।

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ফরাসী বিপ্লবে পিকনিকের কর্মকর্তা

ফরাসী রাজপুরুষরা,

ফ্রান্স ছেড়ে পালিয়ে অস্ট্রিয়া, প্রুশিয়া, আমেরিকায় জড়ো হয়। বেশিরভাগ পাড়ি দেয় ইংল্যান্ড। 

এভাবেই ফরাসী রাজপুরুষদের সাথে

পিকনিক ফ্রান্স জার্মানী সুইডেন ঘুরে  চলে আসে ইংল্যান্ডে।


(1763 সালে লেডি মেরি কোক বোনকে লেখা চিঠিতে পিকনিক পার্টির কথা উল্লেখ করেছেন) 


(উনিশ শতকের শুরুতে ইংল্যান্ডে একত্রে বসে খাওয়ার ‘পিকনিক সোসাইটি’র উদ্ভব ঘটে।)

 ভিক্টোরিয়ান ব্রিটেনে পিকনিক ছিল সামন্ত প্রভুদের এস্টেটের আউটডোরে খাওয়া-দাওয়ার অলস অবসর।


পরে মধ্যবিত্তের জীবনে আসে পিকনিক অবকাশ। ইনডোরের বদলে আউটডোরে পিকনিক হয়ে ওঠে জনপ্রিয়।



চড়ুইভাতির সেকাল-একাল

চড়ুইভাতি বা বনভোজনের ইতিহাস আমাদের বেশ পুরনো। একটা সময় গ্রাম্য আবহে চোখে পড়ত দল বেঁধে রান্না-বান্না, খাওয়া-দাওয়া। তার আগে সংগ্রহ করা হতো চাল-ডাল, কেউ দিত মসলাপাতি। পাঠা, হাস  না মুরগি? এ দ্বন্দ্ব মেটাতেন মা-কাকিমারা। 

বাড়ির উঠোনেই চলতো রান্না, 

দুপুর গড়িয়ে বিকেল হলেই লাগেজেতো

হুড়ো-হুড়ি।


তাতেই শিশুদের মন  আল্লাদে আটখানা ।

মাটিতে বসে কলাপাতায় সেই ভোজ খাওয়া,

সেএক আনন্দের শিহরণ জাগানো আদরে 

বিভোর হওয়া।

একদল রাঁধতো, অন্যরা  হৈ হুল্লোড়ে মেতে উঠত। 

কাছে নদীতে  বা পুকুরে ডুব সাঁতাররের রেষারেষি চলতো।

চলতো কানামাছি ভোঁ ভোঁ, হাডুডু,

দারিয়াবান্দা, খেলা


অনেকেই মনে করেন  ‘বনভোজনে’র সঙ্গে বাঙালিকে প্রথম পরিচিতি ঘটিয়েছেন কবিগুরু রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর 1911 সালে,

তাঁর প্রকাশিত নাটক  ‘অচলায়তন,’ 

কবিগুরু নতুন শব্দ লেখেন "বনভোজন"। 


চোখের বালি উপন্যাসে আশালতা আর বিনোদিনীর সুন্দর পিকনিকের বেলা হৃদয়ে গেঁথে যায়। 


সত্যজিৎ রায়ের ‘অরণ্যের দিনরাত্রি’র একটি দৃশ্যে পিকনিকে খেলতে বসে মেমোরি গেম দৃষ্টিনন্দন হয়ে আছে। 


মার্গারেট মিসেলের ‘গন উইথ দ্য উইন্ড’ নির্মিত হয়েছে একদল নগরবাসীর বনে গিয়ে পিকনিকে খাওয়ার প্রস্তুতি নিয়ে।


বনভোজন ও শিক্ষা সফর

বাঙালির জীবনে শীত মৌসুম এখন প্রীতি উৎসবে পরিণত হয়েছে। 

সঙ্গে যোগ হয়েছে বিচিত্র অনুষঙ্গ।


 দর্শনীয় স্থান পর্যটন এলাকা, কিংবা নিসর্গের কোন স্থানে দলবল নিয়ে ভ্রমণে গিয়ে একদিন বা কয়েক দিন অবস্থান পিকনিকের আমেজ পেয়েছে। 


কখনও সবাই মিলে পিকনিকের স্থান নির্ধারণ করা হয়। বনভোজনের আরও আধুনিক নাম হয়েছে শিক্ষা সফর। 


অর্থাৎ বিভিন্ন শিক্ষা প্রতিষ্ঠানের শিক্ষার্থীরা প্রতি বছর বিশেষ করে শীত মৌসুমে দেশের বিভিন্ন দর্শনীয় স্থানে বেড়ানোর উদ্দেশ্যে বনভোজন বা শিক্ষা সফরের নামকরণে বনবোজন বা পিকনিক হচ্ছে।


হারিয়ে যাওয়া চড়ুইভাতি

‘একদিন দল বেঁধে ক’জনে মিলে যাই ছুটে খুশিতে হারিয়ে’… মান্না দের কণ্ঠের জাদুকরী গান মনে করিয়ে দেয়। ছেলেবেলার ‘রাঁধাবাড়া খেলা’ আজ কলেজ-ভার্সিটির জীবনে বাসে ‘বনভোজন’ ব্যানার টাঙ্গিয়ে দূরে কোথাও যাওয়া, বিচিত্রানুষ্ঠান কতই না মধুর। 


সুন্দর কণ্ঠের সঙ্গে হেড়ে গলার গানও চলে। 


আজকাল চড়ুইভাতি, বনভোজন বা পিকনিকের তকমা নিয়ে করপোরেট কালচারে রূপ নিয়েছে।

আর আমাদের গ্রামীণ পরিবেশের সেই ছোট্টবেলার চড়ুইভাতি আজ  বিলুপ্ত প্রায়।


আধুনিকতার ছোঁয়ায় চড়ুইভাতি হারিয়ে যাচ্ছে বনভোজন পিকনিক আরো কত নামের ভীরে।

মনেহয় নতুন প্রজন্মের কাছে চড়ুইভাতির  বিশেষত্বটা তুলে ধরা উচিত। এতে করে বাঙালির ঐতিহ্য ইতিহাসের পাতায় স্মরণীয় হয়ে থাকবে হাজার বছর ধরে।

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